तेल अवीव, 22 अप्रैल (आईएएनएस)। पाकिस्तान ने दशकों से खुद को आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में एक साझेदार के रूप में पेश किया है, लेकिन साथ ही वह ऐसे आतंकी नेटवर्क को समर्थन देता रहा है जो क्षेत्रीय अस्थिरता से जुड़े हैं। यह बात बुधवार को आई एक रिपोर्ट में सामने आई।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि कुख्यात आतंकवादी ओसामा बिन लादेन 2011 में मारे जाने से पहले पाकिस्तान की सैन्य व्यवस्था के काफी पास रहते हुए भी पकड़ा नहीं गया था।
टाइम्स ऑफ इजरायल के लिए लिखते हुए इटली के राजनीतिक सलाहकार, लेखक और भू-राजनीतिक विशेषज्ञ सर्जियो रेस्टेली ने कहा कि ये घटनाएं कोई अपवाद नहीं हैं, बल्कि एक ऐसे पैटर्न का हिस्सा हैं जिसमें पाकिस्तान की नीति दो अलग-अलग रास्तों पर चलती है।
रेस्टेली ने लिखा, “पहलगाम हमले की पहली बरसी पर बात सिर्फ याद करने की नहीं है, जवाबदेही की भी है। कश्मीर में 26 हिंदू नागरिकों की हत्या कोई अकेली घटना नहीं थी। यह एक बड़े आतंकी तंत्र का हिस्सा थी, जिसे सीमाओं के पार से समर्थन, सुरक्षा और बढ़ावा मिलता है। एक साल बाद सवाल सिर्फ यह नहीं है कि उस दिन क्या हुआ, बल्कि यह भी है कि ऐसे हालात बनने की वजह क्या थी और तब से क्या बदला है।”
उन्होंने आगे कहा कि एक गहरी कहानी भी चल रही है, जो पश्चिमी चीन से शुरू होकर पाकिस्तान के इंफ्रास्ट्रक्चर के रास्ते ईरान के मिसाइल कार्यक्रम तक जाती है। यह खुली साझेदारी की नहीं, बल्कि परतों में छिपे इनकार, लॉजिस्टिक सुविधा और रणनीतिक ‘आउटसोर्सिंग’ की कहानी है।
रेस्टेली के अनुसार, पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर की हाल की शांति की बातें किसी बदलाव का संकेत नहीं हैं, बल्कि उसी दोहरी नीति का नया और ज्यादा स्मार्ट रूप है।
उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तनाव कम करने की बातें अक्सर अंदरूनी स्तर पर ताकत बढ़ाने के साथ-साथ चलती हैं। कूटनीतिक बातचीत से जगह मिलती है, जगह से समय मिलता है, और आज के हालात में समय सबसे कीमती चीज है।
उन्होंने आगे कहा कि अगर ईरान की ताकत कमजोर हुई है, तो उसे फिर से खड़ा होने के लिए समय चाहिए। अगर बाहरी सप्लाई चेन पर नजर रखी जा रही है, तो उन्हें अप्रत्यक्ष रास्ते और बीच के लोगों की जरूरत होगी। अगर वॉशिंगटन का दबाव बना रहता है, तो उससे सीधा टकराने के बजाय उसे झेलने की रणनीति अपनाई जाती है।
रेस्टेली का कहना है कि पाकिस्तान खुद को शांति स्थापित करने वाला देश कम और समय खरीदने वाला खिलाड़ी ज्यादा बनकर पेश करता है, जो स्थिरता की बात करके दूसरे नेटवर्क्स को खुद को बदलने, ढलने और टिके रहने का मौका देता है।
उन्होंने कहा कि पहलगाम की पहली बरसी सिर्फ नुकसान को याद करने का समय नहीं है। यह समझने का भी समय है कि अलग-अलग जगहों (कश्मीर से लेकर मिडिल ईस्ट तक) इनकार की ये व्यवस्थाएं कैसे काम करती हैं। देश कभी एक ही आवाज में बात नहीं करते। वे खुले और छिपे, औपचारिक और अनौपचारिक कई स्तरों पर काम करते हैं। यह दोहरापन खत्म नहीं हुआ है, बल्कि अब और ज्यादा जगहों तक फैल गया है।
--आईएएनएस
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